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पीठोरि अमावस्या/दर्श अमावस्या/कुशोत्पाटनी अमावस्या/कुशपतनी अमावस्या/भाद्रपद(भादो) अमावस्या पूजन और महत्व साथ ही के दिन ये उपाय कर सकते हैं

भाद्रपद(भादो) के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को भाद्रपद अमावस्या कहते हैं इसे भादो अमावस्या या पिठोरि अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है इस दिन माँ दुर्गा की पूजा अर्चना की जाती है मान्यता है कि इस दिन माँ पार्वती ने पिठोरि अमावस्या के व्रत का महत्व बताया था 

गुरु गोरक्षनाथ के जन्म की रोचक कथा

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गुरु गोरक्षनाथ के जन्म की रोचक कथा। गुरु गोरखनाथ के जन्म के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित है। उन्हीं में से एक कथा यहां प्रस्तुत है। एक बार भिक्षाटन के क्रम में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ किसी गांव में गए। किसी एक घर में भिक्षा के लिए आवाज लगाने पर गृह स्वामिनी ने भिक्षा देकर आशीर्वाद स्वरूप पुत्र की याचना की। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ सिद्ध तो थे ही। अतः गृह स्वामिनी की याचना स्वीकार करते हुए उन्होंने एक चुटकी भर भभूत देते हुए कहा कि इसका सेवन करने के बाद यथासमय वे माता बनेंगी। उनके एक महा तेजस्वी पुत्र होगा जिसकी ख्याति चारों और फैलेगी। आशीर्वाद देकर गुरु मत्स्येन्द्रनाथ अपने भ्रमण क्रम में आगे बढ़ गए। बारह वर्ष बीतने के बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उसी ग्राम में पुनः आए। कुछ भी नहीं बदला था। गांव वैसा ही था। गुरु का भिक्षाटन का क्रम अब भी जारी था। जिस गृह स्वामिनी को अपनी पिछली यात्रा में गुरु ने आशीर्वाद दिया था, उसके घर के पास आने पर गुरु को बालक का स्मरण हो आया। उन्होंने घर में आवाज लगाई। वही गृह स्वामिनी पुनः भिक्षा देने के लिए प्रस्तुत हुई। गुरु ने बालक के विषय में पूछा। गृहस्...

नव नाथ चौरासी सिद्ध और नाथ साम्प्रदाय के रहस्य

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प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली दफे व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रुप में जाना जाता है। परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे सिले कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को सींगी सेली कहते हैं। इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर श्आदेशश् या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से...

एक दिन जब गोरख नाथ जी कबीर साहब के साथ रैदास जी से मुलाकात करने पहुँचे और फिर वहां क्या वृतांत

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गोरखनाथ जी को एक दिवस इच्छा हो गई कि कबीर साहब से मिला जाये !कबीर साहब उस समय मे एक ऐसे संत हुये की उनके पास हिन्दू मुसलमानकोई भी हो  सब समान भाव उनमे रखते थे ! और ऐसा ही उस समय केसंत समाज मे भी उनसे हर पंथ , हर सम्प्रदाय का महात्मा उनसे भेंट मुलाकात करके प्रसन्न होता था ! इनके बारे विस्तृत चर्चा फिर कभी करेंगे !अभी हम इस कहानी को आगे बढायेंगे ! अपने प्रोग्राम अनुसार गोरखनाथ कबीरसाहब के पास पहुंच गये। कबीर ने उनका बडा आदर सत्कार किया और दोनो महात्माओं मे सत्सन्ग चर्चाचलती रही ! इतनी देर मे कमाली जो कि कबीर की बेटी थी वो आ गई ! और कबीर साहब से बोली – मैं तैयार हूं ! अब चले ! कबीर साहब ने कमाली का परिचय गोरख से करवाया और कमाली उनको प्रणाम करके बैठ गई ! गोरखनाथ जी ने पूछा कि आपका कहां जाने का प्रोग्राम था ? तब कबीर साहब ने बताया कि हम संत रैदास जी के पास मिलने जाने वाले थे ! और कबीर साहब यह तो कह नही पाये कि अब आप आगये तो नही जायेंगे , क्योंकी उनका वहां जाना जरुरी था ! अब कबीर साहब बोले – गोरखनाथ जी आप भी हमारे साथ चलें तो बडा अच्छा हो ! रैदास जी बहुत पहुंचे हुये महात्मा ह...

पद्मा/परिवर्तनी/अजा एकादशी व्रत कथा विधि सहित

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भाद्रपद पद्मा/परिवर्तनी एकादशी व्रत कथा युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान भाद्रपद कृष्ण पक्ष एकादशी का क्या नाम है इसकी विधि तथा महात्म्य कृपा करके बताये तब भगवान कृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य,स्वर्ग और मोक्ष देने वाली तथा सब पापो का नाश करने वाली उत्तम वामन एकादशी का महात्म्य मैं तुमसे कथा हूँ तुम ध्यान पूर्वक सुनो lयह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें। जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। यह एकादशी जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका यज्ञ करने से वाजपेय यज्ञ का फ...

फायदे #लौंग के घरेलु नुस्खे

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फायदे #लौंग के घरेलु नुस्खे    1. एसिडिटी, हार्टबर्न, पेट का अल्सर और डायरिया जैसी समस्याओं में लहसुन का सेवन बंद कर देना चाहिए। लहसुन इन समस्याओं को बढ़ा सकता है। 2. एनिमिया के मरीजों के लिए भी लहसुन का सेवन हानिकारक हो सकता है। इस स्थिति में लहसुन का सेवन हीमोग्लोबिन में कमी का कारण बन सकता है, जिसे हीमोलाइटिक एनिमिया भी कहते हैं। 3. अगर आपको निम्न रक्तचाप यानि लो ब्लड प्रेशर की समस्या है, तो लहसुन का सेवन करने से बचें। यह रक्तचाप को और कम कर सकता है। इसके विपरीत हाई ब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए लहसुन का प्रयोग करना रक्तचाप को कम करने में मददगार होगा।  4. गर्भास्था में लहसुन खाना काफी खतरनाक साबित हो सकता है। लहसुन की गर्म प्रकृति होने के कारण यह गर्भस्थ शिशु के लिए हानिकारक साबित हो सकता है, इसलिए इससे बचें। 5. अगर आप किसी तरह का ऑपरेशन या सर्जरी करवाने वाले हैं, तो लहसुन का प्रयोग समस्या का कारण बन सकता है। यह खून को पतला करता है और इन स्थिति में सर्जरी के वक्त ब्लीडिंग अधिक हो सकती है। *रात को बार-बार #नींद खुल जाती है, तो ये 5 उपाय आपके लिए हैं*  ...

जन्‍माष्‍टमी व्रत की ये विशेष कथा आप को दिलाएगी सब कष्टों से मुक्ति और प्रभु कृपा, आओ श्रवण करे l

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कन्‍हैया जन्‍माष्‍टमी कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी त‍िथि जन्‍माष्‍टमी यानी कन्‍हैया का जन्‍मद‍िन भाद्रपद माह के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी तिथि को मनाया जाता है। इस द‍िन भक्‍त मध्‍यरात्रि में कन्‍हैया का श्रृंगार करके भोग लगाकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इसी के साथ कान्‍हा के जन्‍म की कथा सुनते हैं। मान्‍यता है कि कन्‍हैया जन्‍म की यह अद्भुत कथा सुनने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है। साथ ही मुरली मनोहर की कृपा से जीवन में सुख-शांत‍ि और धन-ऐश्‍वर्य का वास होता है। तो आइए जानते हैं क्‍या है जन्‍माष्‍टमी की यह व्रत कथा? स्‍कंद पुराण में है जन्‍माष्‍टमी की यह व्रत कथा स्‍कंद पुराण के अनुसार द्वापर युग की बात है। तब मथुरा में उग्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा हुए। लेकिन स्‍वभाव से वह सीधे-साधे थे। यही वजह थी कि उनके पुत्र कंस ने ही उनका राज्‍य हड़प लिया और स्‍वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन थी, जिनका नाम था देवकी। कंस उनसे बहुत प्रेम करता था। फिर देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ तो विवाह संपन्‍न होने के बाद कंस स्‍वयं ही रथ हांकते हुए बहन को ससुराल छोड़ने के लिए र...